हमीरपुर।,
प्रतिभा किसी पहचान की मोहताज नहीं होती ,प्रतिभा ईश्वर का दिया हुआ वह अनमोल उपहार है जो किसी परिचय, पद, धन या प्रसिद्धि की मोहताज नहीं होती। सच्ची प्रतिभा अपने कार्य, मेहनत और उत्कृष्ट प्रदर्शन के बल पर स्वयं अपनी पहचान बना लेती है। इतिहास गवाह है कि अनेक महान व्यक्तियों ने साधारण परिस्थितियों से शुरुआत की, लेकिन अपनी लगन, आत्मविश्वास और निरंतर प्रयास के कारण दुनिया में अपनी अलग पहचान स्थापित की। प्रारंभ में भले ही प्रतिभा को उचित मंच या सम्मान न मिले, परंतु समय के साथ उसकी चमक स्वयं लोगों का ध्यान आकर्षित करती है।
इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी प्रतिभा पर विश्वास रखते हुए निरंतर मेहनत करनी चाहिए, क्योंकि वास्तविक प्रतिभा को कभी दबाया नहीं जा सकता। अंततः वही व्यक्ति सफल होता है जो अपनी योग्यता को कर्म और समर्पण के माध्यम से सिद्ध करता है।
हमीरपुर।
आकाशवाणी, हमीरपुर के वरिष्ठ उदघोषक संजय शर्मा को पहाड़ी बोली एवं लोक संस्कृति के प्रचार-प्रसार तथा उत्थान में उनके योगदान के लिए पहाड़ी भाषा (बोली) विकास संगम संस्था, पालमपुर आंद्रेट ने ‘शिखर सम्मान 2026’ से सम्मानित किया है। इस अवसर पर संस्था के अध्यक्ष रमेश कटोच,सचिव संजय मेहरा, मुख्य संरक्षक डाक्टर धनी राम सांख्यान, कोष प्रभारी ओम प्रकाश भी उपस्थित थे। गौरतलब है कि संजय शर्मा पिछले करीब तीन दशकों से आकाशवाणी में अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। पहाड़ी बोली में हास्य नाटिका ‘असा दा संदूकुडू’ और ‘रीडीया दी तान’ में माठू राम की भूमिका निभाने के अलावा कार्यक्रम ‘गल तुसां दी’ कार्यक्रम के प्रणेता भी हैं। उन्होंने इन कार्यक्रमों से अपने श्रोताओं के दिलों में ख़ास पहचान बनाई है। अपनी प्रतिभा के बल पर कई सामाजिक मुद्दों, लोक संस्कृति और परंपराओं से श्रोताओं को रू-ब-रू करवाने में उन्होंने अग्रणी भूमिका निभाई है। भाषा एवं कला संस्कृति विभाग, हमीर उत्सव, राष्ट्र स्तरीय सुजानपुर होली उत्सव और अंतर्राष्ट्रीय मंडी शिवरात्रि में आयोजित होने वाली सांस्कृतिक संध्याओं में बतौर निर्णायक मंडल में वे अपनी सहभागिता दर्ज करवा चुके हैं। इसके अलावा उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय कुल्लू दशहरा, मंडी शिवरात्रि, सुजानपुर की होली और देश में हरिद्वार, प्रयागराज, नासिक और उज्जैन में आयोजित होने वाले कुंभों का आंखों देखा हाल भी प्रस्तुत कर चुके हैं। छात्र जीवन से लोक संस्कृति एवं नाट्य विधा से जुड़े होने से कई राष्ट्र स्तरीय आयोजनों में भी शिरकत कर चुके हैं। उन्होंने इसका श्रेय आकाशवाणी हमीरपुर को दिया है।
उनका कहना है कि लोक संस्कृति से जुड़े रीति-रिवाज़, परम्पराएँ, कथाएँ, कहानियाँ, गाथाएँ, गीत, पहनावा, खान-पान आदि हमारी सांस्कृतिक विरासत हैं। इनका संरक्षण तभी संभव है जब हम अपनी जड़ों से जुड़े रहें। आने वाली पीढ़ी को इस विरासत को संभालकर रखना चाहिए और अपनी लोक बोली में बातचीत करने में गुरेज़ नहीं करना चाहिए

Author: Himachal Samvaad











